हिंदी के आधुनिक काल तक आते-आते ब्रजभाषा जनभाषा से काफ़ी दूर हट चुकी थी और अवधी ने तो बहुत पहले से ही साहित्य से मुँह मोड़ लिया था। 19वीं सदी के मध्य तक अंग्रेज़ी सत्ता का महत्तम विस्तार भारत में हो चुका था। इस राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव मध्य देश की भाषा हिंदी पर भी पड़ा। नवीन राजनीतिक परिस्थितियों ने खड़ी बोली को प्रोत्साहन प्रदान किया। जब ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक रूप जनभाषा से दूर हो गया तब उनका स्थान खड़ी बोली धीरे-धीरे लेने लगी। अंग्रेज़ी सरकार ने भी इसका प्रयोग आरम्भ कर दिया। हिंदी के आधुनिक काल में प्रारम्भ में एक ओर उर्दू का प्रचार होने और दूसरी ओर काव्य की भाषा ब्रजभाषा होने के कारण खड़ी बोली को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। 19वीं सदी तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। 20वीं सदी के आते-आते खड़ी बोली गद्य-पद्य दोनों की ही साहित्यिक भाषा बन गई। इस युग में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने में विभिन्न धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों ने बड़ी सहायता की। फलतः खड़ी बोली साहित्य की सर्वप्रमुख भाषा बन गयी। भारतीय आर्य भाषाओं का प्रारंभ १५०० ई. प...
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Showing posts from April, 2024
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देश में तकनीकी और आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ अंग्रेजी पूरे देश पर हावी होती जा रही है। हिन्दी देश की राजभाषा होने के बावजूद आज हर जगह अंग्रेजी का वर्चस्व कायम है। हिन्दी जानते हुए भी लोग हिन्दी में बोलने, पढ़ने या काम करने में हिचकने लगे हैं। इसलिए सरकार का प्रयास है कि हिन्दी के प्रचलन के लिए उचित माहौल तैयार की जा सके। राजभाषा हिंदी के विकास के लिए खासतौर से राजभाषा विभाग का गठन किया गया है। भारत सरकार का राजभाषा विभाग इस दिशा में प्रयासरत है कि केंद्र सरकार के अधीन कार्यालयों में अधिक से अधिक कार्य हिंदी में हो। इसी कड़ी में राजभाषा विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जाता है। 14 सितंबर, 1949 का दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस निर्णय को महत्व देने के लिए और हिन्दी के उपयोग को प्रचलित करने के लिए साल 1953 के उपरांत हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हिंदी भाषा भारत आधिकारिक भाषा कब बनी:- 26 जनवरी, 1965 को हिंदी भारत की आधिकारिक भाषा ...
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हिंदी को हम भाषा की जननी, साहित्य की गरिमा, जन-जन की भाषा और राष्ट्रभाषा भी कहते हैं। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि हिंदी भविष्य की भाषा है। हां, एक बात जरूर है कि हम इस भाषा का प्रयोग वास्तविक जीवन में जरूर करते है लेकिन यह रोजगार और महत्वाकांक्षी की भाषा बनने में थोड़ी कारगर नहीं बन पाई। इससे यह जाहिर नहीं होता कि हिंदी का विकास नहीं हुआ। उपरोक्त में कई ऐसे तथ्य हैं, जो पूर्ण रूप से साबित करते हैं कि हिन्दी का विकास कितनी तेजी से हुआ है। हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपना बधाई संदेश हिंदी में प्रसारित करते हैं क्योंकि हिंदी भाषा अपनत्व का बोध कराती है। जातीय भाषा का विकास वैसे ही नहीं होता जैसे किसी जनपदीय भाषा का होता है। कोई जनपदीय भाषा ज्यो की त्यों जातीय भाषा बन जाये, ऐसे नहीं होता। किसी जनपदीय भाषा को मुख्य आधार बनाकर कोई जातीय भाषा विकसित होती है किन्तु उसमे अन्य जनपदो से भाषा तत्त्व आकर घुल मिल जाते हैं और आधार भाषा के रूप को काफी बदल देते हैं। इस तरह की प्रक्रिया हर जातीय भाषा के साथ घटित होती है। कलकत्ता की मानक बांगला या पुणे की मानक ...
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हिंदी देश को एकता की डोर में बांधने का काम करती है। आजादी की लड़ाई में जब पूरा देश अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहा था तब देश के कवियों और साहित्यकारों ने अपनी कलम की क्रांति से वो हुंकार भरी थी कि देश के युवा से लेकर हर वर्ग स्वतंत्रता पाने को लेकर व्याकुल हो उठे थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में हमारी सबसे बड़ी ताकत एकता थी और उस वक्त पूरे देश को एक सूत्र में बांधने में हिंदी ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। सैकड़ों बोलियों और भाषा वाले इस देश में हिंदी का स्थान अद्वितीय है। हजारों साल पुरानी इस भाषा ने न केवल पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है बल्कि आजादी की लड़ाई के दिनों में सबसे मुखर और मजबूत सम्पर्क सूत्र के रूप में भी काम किया। धीरे-धीरे हिंदी पुष्पित और पल्लवित होती गई और आज दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा बन गई है। अंग्रेजी, स्पेनिश और मंदारिन के बाद हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हमारे देश में ही करीब 77 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते, समझते और पढ़ते हैं। पूरी दुनिया में "हिंदी" हमारी पहचान बन चुकी है। मानक हिंदी का विकास: अष्टाध्यायी, अंगु...
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19वीं सदी के बाद काल हिंदी के इतिहास में आधुनिक काल माना जाता है. इस दौरान हिंदी कई बदलावों से गुजरी अंग्रेजी के प्रभाव के साथ साथ हिंदी का भी प्रभाव बढ़ता दिखाई दिया. पहले खड़ी बोली का प्रभुत्व रहा और धीरे धीरे हिंदी फारसी के प्रभाव से भी मुक्त होने लगी. 1860 के बाद हिंदी के गद्य स्वरूप का विकास होने लगा था. इसके बाद भारतेंदु हरीशचंद्र ने हिंदी को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया और उन्हें आधुनिक हिंदी का पितामह कहा जाता है. भाषा वैज्ञानिकों के मुताबिक हिंदी साहित्य का इतिहास वैदिक काल से आरंभ होता है। समय-समय पर इसका नाम बदलता रहा। कभी वैदिक, कभी संस्कृत, कभी प्राकृतिक, कभी अपभ्रंश और अब हिंदी। हिंदी भाषा के उद्भव और विकास की प्रचलित धारणाओं के मुताबिक प्रकृत के अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी का उद्भव माना जाता है। इसे विद्यापति ने देसी भाषा कहा। हिंदी साहित्य का आरंभ 8वीं शताब्दी से माना जाता है। बौद्ध धर्म की एक शाखा वज्रयान के सिद्धो जनता के बीच उस समय की लोकभाषा में अपने मत का प्रचार किया। हिंदी का प्राचीन साहित्य इन सिद्धों ने पुरानी हिंदी में लिखा। इसके नाथ पंथी साधुओं ने बौद्ध...
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हिंदी' शब्द का विकास: 'हिंदी' शब्द का विकास संस्कृत शब्द 'सिंध' से माना गया है :सं० सिंध > फ़ा० हिन्द। फ़ारस - वासियों ने हिंदी के निवासियों की भाषा को 'हिंदी' कहा। अरब-फ़ारस के भारतीय राज्यों के विजेताओं के राज्य-प्रसार के साथ-साथ 'हिन्द' तथा 'हिंदी' का भी प्रसार होता गया । क्षेत्र की इस व्याप्ति के फलस्वरूप हिंदी न सिंध की भाषा रही, न पंजाब की, न दिल्ली और उत्तर प्रदेश की, बल्कि अरब फ़ारस विजेताओं के लगातार विस्तृत साम्राज्य की भाषा बनती गयी। इस दृष्टि से आज की हिंदी न मात्र सिंधी से विकसित है, न संस्कृत से, न फ़ारसी से, न पालि से, न प्राकृत से, न अपभ्रंश से, न राजस्थानी से, न अंग्रेजी से बल्कि इसे वर्त्तमान रूप में इन सभी तथा अन्य अनेक जातीय भाषाओं की सम्पृक्ति के फल-स्वरुप कौरवी की आधार शिला पर खड़ी स्वतन्त्र रूप में विकसित भाषा माना जा सकता है। अपने विकास की अनेक मंजिलों में इसने अरबी-फ़ारसी-अंग्रेजी आदि को जहां अनेक शब्द दिए हैं, वहाँ उनसे अनेक शब्द एवं भाषिक तत्त्व ग्रहण भी किये हैं। हिंदी-प्रदेश से अरबी में गए कुछ सब्दों का उदाहरण ये है...
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हिंदी का विकास: हिंदी में अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पश्तो, अंग्रेजी, पुर्तगाली, प्रांसीसी, स्पेनिश, डच आदि अनेक भाषाओं से शब्द आये हैं। इनकी सूची बहुत लम्बी है। आगत शब्दों की संख्या के आधार पर इनका क्रम इस प्रकार निर्धारित किया जा सकता है- अंग्रेजी, फ़ारसी, आरबी, तुर्की, पुर्तगाली, फ़्रांसीसी, पश्तो, स्पेनिश, डच। इनके अतिरिक्त इस भाषा ने सिंधी, पंजाबी, गुजरती, मराठी,उड़िया, बांग्ला, द्रविड़, एवं मुंडा आदि जातीय भाषाओं से भी शब्द ग्रहण किये हैं। कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं- कर्ण, धर्म, ज्ञान (संस्कृत), कान्ह, चन्द, चाँद, चांदी, पत्ता, पात, आग, आम, साँझ, बूँद,नींद (पालि-प्राकृत-अपभ्रंश आदि); अनार, कमीज़, कलम, कारख़ाना, कारीगर, किताब, कुरता, ख़ुशामद, चादर, जलेबी, जिल्द, ताज़ा, दवात, नक़द, नफ़ा, नुकसान, प्याला, बर्फी, बादाम, बेईमान, बेकार, मज़दूर, शिकायत, सिफ़ारिश, सुराही (अरबी-फ़ारसी); उजबक, उर्दू, कलगी, काबू, कुली, कैची, गलीचा, चाक़ू, चिक, तमगा, तोप, दरोगा, लाश, सौग़ात (तुर्की); पठान, रोहिला (रोह=पहाड़) (पश्तो); कनस्तर (पुर्तगाली); सांई (सिंधी); लहँड़ा (पंजाबी); कोड़ी (सं...
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ध्वनि एवं रूप-रचना: हिंदी भाषा ने अन्य भाषाओं से केवल शब्द ही ग्रहण नहीं किए बल्कि ध्वनि एवं रूप-रचना का प्रभाव भी इस भाषा पर पड़ा है। इस भाषा ने फ़ारसी से क़, ख़, ग़, ज़, फ़ तथा अंगड़ाई से ऑ (डॉक्टर), फ (सेफ्टीरेज़र, ऑफिस) ध्वनियाँ, संस्कृत के लगभग सभी उपसर्ग और प्रत्यय, फारसी के आन, हा (बहुवचनसूचन); फ़ारसी-आरबी आन (बहुवचनसूचक) प्रत्यय (कहीं बहुवचन में, कहीं एकवचन में प्रयुक्त) जैसे- साहेबान, बारहा, कागज़ात, देहात; तर, तमार्थी फ़ारसी प्रत्यय= तर-तरीन बदतर, बेहतरीन, हिंदी में प्रयुक्त होते हैं। भोजपुरी के प्रभाव के कारण परसर्ग 'ने' के प्रयोग का लोप किया है या कही-कही गलत प्रयोग। आजकल पंजाबी के प्रभाव के कारण हिंदी में 'ने' परसर्ग के गलत प्रयोग की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है जैसे-"मैंने घर जाना है।"' ब्रज के प्रभाव से पास के स्थान 'पर' या 'पै' के प्रयोग मिलते हैं जैसे-उस पर कपडा नहीं है, उनपै धोती नहीं है, आदि।
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"हिन्दी" शब्द की व्युत्पति: जैसे इस परिच्छेद के शुरू में कहा गया है 'हिन्दी' शब्द का विकास संस्कृत शब्द 'सिन्ध' से माना गया है : सं सिन्ध> फ़ा हिन्द/फ़ारस के लोग हिन्दुस्तान अर्थात भारत के लिए 'हिन्द' शब्द का प्रयोग क्यों और कैसे करने लगे थे, इस संबंध में एक अत्यंत रोचक तर्क दिया जाता है। आरम्भ में एक पाश्चात्य भाषा-शास्त्रों ने 'हिन्दी' शब्द की व्युत्पत्ति की खोज करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि संस्कृत का 'स' फ़ारसी में 'ह' उच्चित होता है। अर्थात संस्कृत के शब्दों में आने वाला 'स' अक्षर फ़ारसी में 'स' की ध्वनि न दे कर 'ह' ही बोला जाता है। उन्होंने ने कहा कि आरम्भ में जब फ़ारस और भारत का संबंध स्थापित हुआ तो फ़ारसी लोग सिन्धु नदी तथा उस के दोनों तटों पर फैले सिन्धु प्रदेश तक आए और उपर्युक्त भाषा-शास्त्रीय नियम के अनुसार मजबूर हो कर 'सिन्धु' और 'सिन्ध' को 'हिन्दु' और 'हिन्द' कहने लगे। बाद में, धीरे-धीरे यह 'हिन्द' शब्द संपूर्ण भारत के लिये प्रयुक्त होने लगा। फ़ारसी लोग हिन...
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हिंदी भाषा भारत का राजभाषा भाषा है। यह भाषा मुख्य रूप से उत्तर भारत में बोली जाती है। केंद्रीय स्तर पर भारत में सह-आधिकारिक भाषा हिंदी है। यह हिंदुस्तानी भाषा के शब्द समान हैं। हिन्दी संविधान से भारत की राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बात करने वाली भाषा बोलने वाली भाषा है। हिन्दी भारत की संविधान में राष्ट्र की भाषा को परिभाषित किया गया है। हम कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाएं परंतु हमें अपनी मुख्यधारा से जुड़ा रहना जरूरी होता है। इसी तरह किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए वहां की भाषाओं से ओतप्रोत होना भी जरूरी होता है। राष्ट्रभाषा हिंदी इसी...
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प्रमुख रचनाकार · ब्रजभाषा : हिन्दी के मध्यकाल में मध्य देश की महान भाषा परंपरा के उत्तरदायित्व का पूरा निर्वाह ब्रजभाषा ने किया। यह अपने समय की परिनिष्ठित व उच्च कोटि की साहित्यिक भाषा थी, जिसको गौरवान्वित करने का सर्वाधिक श्रेय हिन्दी के कृष्णभक्त कवियों को है। पूर्व मध्यकाल (अर्थात भक्तिकाल)में कृष्णभक्त कवियों ने अपने साहित्य में ब्रजभाषा का चरम विकास किया। पुष्टि मार्ग/शुद्धाद्वैत संप्रदाय के सूरदास ('सूर सागर'), नंद दास, निम्बार्क संप्रदाय के श्री भट्ट, चैतन्य संप्रदाय के गदाधर भट्ट, राधा-वल्लभ संप्रदाय के हित हरिवंश (श्री कृष्ण की बाँसुरी के अवतार) एवं संप्रदाय-निरपेक्ष कवियों में रसखान, मीराबाई आदि प्रमुख कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा के साहित्यिक विकास में अमूल्य योगदान दिया। इनमें सर्वप्रमुख स्थान सूरदास का है जिन्हें 'अष्टछाप का जहाज' कहा जाता है। उत्तर मध्यकाल (अर्थात रीतिकाल) में अनेक आचार्यो एवं कवियों ने ब्रजभाषा में लाक्षणिक एवं रीति ग्रंथ लिखकर ब्रजभाषा के साहित्य को समृद्ध किया। रीतिबद्ध कवियों में केशवदास, मतिराम, बिहारी, देव, पद्माकर, भिखारी दास, सेन...
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आधुनिककालीन हिन्दी · हिन्दी के आधुनिक काल तक आतेआते ब्रजभाषा जनभाषा से काफी दूर हट चुकी थी और अवधी ने तो बहुत पहले से ही साहित्य से मुँह मोड़ लिया था। 19वीं सदी के मध्य तक अंग्रेजी सत्ता का महत्तम विस्तार भारत में हो चुका था। इस राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव मध्य देश की भाषा हिन्दी पर भी पड़ा। नवीन राजनितिक परिस्थितियों ने खड़ी बोली को प्रोत्साहन प्रदान किया। जब ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक रूप जनभाषा से दूर हो गया तब उनका स्थान खड़ी बोली धीरे-धीरे लेने लगी। अंग्रेजी सरकार ने भी इसका प्रयोग आरंभ कर दिया। · हिन्दी के आधुनिक काल में प्रारंभ में एक ओर उर्दू का प्रचार होने और दूसरी ओर काव्य की भाषा ब्रजभाषा होने के कारण खड़ी बोली को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। 19वीं सदी तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। 20वीं सदी के आते-आते खड़ी बोली गद्य-पद्य दोनों की साहित्यिक भाषा बन गई। · इस युग में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने में विभिन्न धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों ने बड़ी सहायता की। फलतः खड़ी बोली साहित्य की सर्वप्रमुख भाषा बन गयी। खड़ी बोली ·...
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हिंदी के विभिन्न नाम या रूप (1) हिन्दवी/हिन्दुई/जबान-ए-हिन्दी/देहलवी : मध्यकाल में मध्यदेश के हिन्दुओं की भाषा, जिससे अरबी-फारसी शब्दों का अभाव है। [सर्वप्रथम अमीर खुसरो (1253-1325) ने मध्य देश की भाषा के लिए हिन्दवी, हिन्दी शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने देशी भाषा हिन्दवी, हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए एक फारसी-हिन्दी कोश 'खालिक बारी' की रचना की, जिसमें हिन्दवी शब्द 30 बार, हिन्दी शब्द 5 बार देशी भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ है।] (2) भाषा/भाखा : विद्यापति, कबीर, तुलसी, केशवदास आदि ने भाषा शब्द का प्रयोग हिन्दी के लिए किया है। [19 वीं सदी के प्रारंभ तक इस शब्द का प्रयोग होता रहा है। फोर्ट विलियम कॉलेज में नियुक्त हिन्दी अध्यापकों को 'भाषा मुंशी' के नाम से अभिहित करना इसी बात का सूचक है।] (3) रेख्ता : मध्यकाल में मुसलमानों में प्रचलित अरबी-फारसी शब्दों से मिश्रित कविता की भाषा। (जैसे-मीर, ग़ालिब की रचनाएँ) (4) दक्खिनी/दक्कनी : मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों द्वारा फारसी लिपि में लिखी जानेवाली भाषा। [हिन्दी में गद्य रचना परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय दक्कनी हिन्दी के रचनाकार...
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राष्ट्रभाषा (Public Language) क्या है ? (1) राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ है-समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात आम जन की भाषा (जनभाषा) । जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन-जन के विचार-विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। (2) राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद-सम्पर्क की आवश्यकता की उपज होती है। वैसे तो सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ होती हैं किन्तु राष्ट्र की जनता जब स्थानीय एवं तात्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक आवश्यक उपादान समझने लगती है तो वही राष्ट्रभाषा है। (3) स्वतंत्रता- - संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। भारत के संदर्भ में इस आवश्यकता की पूर्ति हिन्दी ने किया। यही कारण है कि हिन्दी स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान (विशेषतः 1900 ई०-1947 ई०) राष्ट्रभाषा बनी। (4) राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता-प्राप्त शब्द है। (5) राष्ट्रभाषा सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं-परंपराओं के द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर ...
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अंग्रेजों का योगदान · राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क-भाषा (interface language) होती है। हिन्दी दीर्घकाल से सारे देश में जन-जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। यह केवल उत्तर भारत की भाषा नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यो-वल्लभाचार्य, रामानुज, आदि-ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिन्दी भाषी राज्यों के भक्त-संत कवियों (जैसे असम के शंकर देव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर व नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य आदि) ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था। · यही कारण था कि जब जनता और सरकार के बीच संवाद-स्थापना के क्रम में फारसी या अंग्रेजी के माध्यम से दिक्कतें पेश आई तो कंपनी सरकार ने फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी विभाग खोलकर अधिकारियों को हिन्दी सिखाने की व्यवस्था की। यहाँ से हिन्दी पढ़े हुए अधिकारियों ने भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उसका प्रत्यक्ष लाभ देखकर मुक्त कंठ से हिन्दी को सराहा। · सी० टी० मेटकाफ ने 1806 ई० में अपने शिक्षा गुरु जान गिलक्राइस्ट को लिखा : 'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता ...
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वाक्य-रचना: वाक्य-रचना की दृष्टि से हिंदी, फ़ारसी तथा अंग्रेजी से प्रभावित रही है। हिंदी की समास रचना प्रवृत्ति पर कहीं कहीं फ़ारसी प्रभाव दिखाई पड़ता है, जैसे- लीक-पखान (लीक-पखान पुरुष कर बोला- जायसी); कलक्टर अलीगढ़; हरी ओध आदि। 'जो' युक्त वाक्यों के प्रयोग काल्डवैल द्रविड़ प्रभाव मानते हैं। प्राकृत पैंगलभ में 'जो चाहहिं सो लेहि' प्रयोग है। हिंदी में इस प्रभाव की वृद्धि का कारण फ़ारसी प्रभाव है। हिंदी में एकवचन के लिए आदरार्थ बहुवचन का प्रयोग फ़ारसी प्रभाव के कारण है। हिंदी के आकारांतेतर विशेषणों की विशेष्य के अनुसार अपरिवर्तनीयता के प्रभाव के पीछे भी फ़ारसी प्रभाव दिखाई पड़ता है क्योंकि फ़ारसी में व्याकरणिक लिंग का अभाव है। हिंदी की संज्ञा एवं विशेषण के योग से निर्मित नामिक क्रियाएँ फ़ारसी का अनुबद्ध हैं जैसे-तंग करना (फ़ा. तंग कर्दन), खुश होना (फ़ा. खुश शुदन) । हिंदी में क्रिया से पूर्व क्रियाविशेषण के प्रयोग पर फ़ारसी प्रभाव है जैसे 'वह जल्दी जल्दी बोल रहा था।' (फ़ा. ऊ बितुंदी मी गुफ्त)। संस्कृत में क्रियाविशेषण का कोई स्थान निर्धारित नहीं था। समुच्चयबोधक ओर के प्रयोग पर...
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धर्म/समाज सुधारकों का योगदान · धर्म/समाज सुधार की प्रायः सभी संस्थाओं ने हिन्दी के महत्व को भाँपा और हिन्दी की हिमायत की। · ब्रह्म समाज (1828 ई०) के संस्थापक राजा राममोहन राय ने कहा : 'इस समग्र देश की एकता के लिए हिन्दी अनिवार्य है' । ब्रह्मसमाजी केशव चन्द्र सेन ने 1875 ई० में एक लेख लिखा-'भारतीय एकता कैसे हो', जिसमें उन्होंने लिखा : 'उपाय है सारे भारत में एक ही भाषा का व्यवहार। अभी जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित है, उनमें हिन्दी भाषा लगभग सभी जगह प्रचलित है। यह हिन्दी अगर भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बनायी जाय, तो यह काम सहज ही और शीघ्र सम्पन्न हो सकता है' । एक अन्य ब्रह्मसमाजी नवीन चन्द्र राय ने पंजाब में हिन्दी के विकास के लिए स्तुत्य योगदान दिया। · आर्य समाज (1875 ई०) के संस्थापक दयानंद सरस्वती गुजराती भाषी थे एवं गुजराती व संस्कृत के अच्छे जानकार थे। हिन्दी का उन्हें सिर्फ कामचलाऊ ज्ञान था, पर अपनी बात अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए तथा देश की एकता को मजबूत करने के लिए उन्होंने अपना सारा धार्मिक साहित्य हिन्दी में लिखा। उनका कहना था कि 'हिन्दी के ...
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राष्ट्रभाषा आंदोलन (हिन्दी आंदोलन) से संबंधित व्यक्तित्व बंगाल : राजा राम मोहन राय, केशवचन्द्र सेन, नवीन चन्द्र राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, तरुणी चरण मित्र, राजेन्द्र लाल मित्र, राज नारायण बसु, भूदेव मुखर्जी, बंकिम चन्द्र चटर्जी ('हिन्दी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में जो ऐक्यबंधन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारतबंधु पुकारे जाने योग्य है'।), सुभाष चन्द्र बोस ('अगर आज हिन्दी भाषा मान ली गई है तो वह इसलिए नहीं कि वह किसी प्रांत विशेष की भाषा है, बल्कि इसलिए कि वह अपनी सरलता, व्यापकता तथा क्षमता के कारण सारे देश की भाषा हो सकती है।'), रवीन्द्र नाथ टैगोर ('यदि हम प्रत्येक भारतीय के नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, तो हमें राष्ट्रभाषा के रूप में उस भाषा को स्वीकार करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने की सिफारिश महात्मा गाँधी ने हमलोगों से की है। इसी विचार से हमें एक भाषा की आवश्यकता है और वह हिन्दी है।'), रामानंद चटर्जी, सरोजनी नायडू, शारदा चरण मित्र (अखिल भारतीय लिपि के ...
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स्वतंत्रता के बाद हिन्दी का राजभाषा के रूप में विकास राजभाषा (Official Language) क्या है ? (1) राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है-राज-काज की भाषा। जो भाषा देश के राजकीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होती है, वह 'राजभाषा' कहलाती है। राजाओं-नवाबों के जमाने में इसे 'दरबारी भाषा' कहा जाता था। (2) राजभाषा सरकारी काम-काज चलाने की आवश्यकता की उपज होती है। (3) स्वशासन आने के पश्चात राजभाषा की आवश्यकता होती है प्रायः राष्ट्रभाषा ही स्वशासन आने के पश्चात राजभाषा बन जाती है। भारत में भी राष्ट्रभाषा हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। (4) राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है। हिन्दी को 14 सितम्बर 1949 ई० को संवैधानिक रूप से राजभाषा घोषित किया गया। इसलिए प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। (5) राजभाषा देश को अपने प्रशासनिक लक्ष्यों के द्वारा राजनीतिक-आर्थिक इकाई में जोड़ने का काम करती है। अर्थात राजभाषा की प्राथमिक शर्त राजनीतिक प्रशासनिक एकता कायम करना है। (6) राजभाषा का प्रयोग-क्षेत्र सीमित होता है, यथा : वर्तमान समय में भारत सरकार के कार्यालयों एवं कुछ राज्य...
हिंदी भाषा का विकास क्रम कुछ इस प्रकार है !
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हिंदी भाषा का विकास क्रम कुछ इस प्रकार है : संस्कृत⇾ पालि⇾ प्राकृत⇾ अपभ्रंश⇾ अवहट्ट⇾ प्राचीन/प्रारम्भिक हिन्दी अगर मैं आपको हिंदी भाषा का इतिहास बताने लग जाऊँ, तो कई रातें लग जाएगी, लेकिन हम उन पहलुओं को आपके सामने जरूर रखेंगे जो आपको जानने की आवश्यकता है। कहते हैं हिंदी भाषा का विकास लगभग 1000 ईस्वी पूर्व हुआ था इसका विकास पाली, संस्कृत, प्रकृति से हुआ है तीन चरणों से गुजारा कर हिंदी भाषा का विकास हुआ एक भाषा के रूप में अगर हिंदी भाषा की विकास यात्रा की बात करें तो यह एक लंबी और सतत प्रक्रिया है। एक भाषा के विकास में उस समाज और संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जहाँ पर ये बोली जाती है। हिंदी भाषा के विकास में भी समाज और संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है; खासकर उत्तर भारतीय राज्यों की भूमिका। भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत रही है और इसी भाषा के विभिन्न काल खंडों में अलग-अलग स्वरूपों में हुए वियोजन से हिंदी का विकास हुआ है। संस्कृत भाषा से पालि, पालि से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से अवहट्ट, अवहट्ट से पुरानी हिंदी और पुरानी हिंदी से आधुनिक हिंदी का विकास हुआ है जि...