हिंदी' शब्द का विकास:
'हिंदी' शब्द का विकास संस्कृत शब्द 'सिंध' से माना गया है :सं० सिंध > फ़ा० हिन्द। फ़ारस - वासियों ने हिंदी के निवासियों की भाषा को 'हिंदी' कहा। अरब-फ़ारस के भारतीय राज्यों के विजेताओं के राज्य-प्रसार के साथ-साथ 'हिन्द' तथा 'हिंदी' का भी प्रसार होता गया । क्षेत्र की इस व्याप्ति के फलस्वरूप हिंदी न सिंध की भाषा रही, न पंजाब की, न दिल्ली और उत्तर प्रदेश की, बल्कि अरब फ़ारस विजेताओं के लगातार विस्तृत साम्राज्य की भाषा बनती गयी। इस दृष्टि से आज की हिंदी न मात्र सिंधी से विकसित है, न संस्कृत से, न फ़ारसी से, न पालि से, न प्राकृत से, न अपभ्रंश से, न राजस्थानी से, न अंग्रेजी से बल्कि इसे वर्त्तमान रूप में इन सभी तथा अन्य अनेक जातीय भाषाओं की सम्पृक्ति के फल-स्वरुप कौरवी की आधार शिला पर खड़ी स्वतन्त्र रूप में विकसित भाषा माना जा सकता है।
अपने विकास की अनेक मंजिलों में इसने अरबी-फ़ारसी-अंग्रेजी आदि को जहां अनेक शब्द दिए हैं, वहाँ उनसे अनेक शब्द एवं भाषिक तत्त्व ग्रहण भी किये हैं। हिंदी-प्रदेश से अरबी में गए कुछ सब्दों का उदाहरण ये हैं: संदल<चन्दन; मस्क<मूषक; तम्बोल<ताम्बूल; काफ़ूर<कपूर; करनफल<कनकफल (लॉन्ग); फिलफिल<पिप्पली, पिप्पला; फोफल<कोबल, गोपदल; जायफल<जायफल; नीलोफर<नीलोत्पल; हेल<एला, इलायची; इत्रीफल<त्रिफला; बलीलह<बहेड़ा; हलीलज<हर्र, हरड़; बलादार<भिलावाँ; शीत <छींट; नीलज<नील: किर्मिज़<किरमिच; मोज <मोचा; नारजील<नारियल, नारिकेल; अम्बज<आम; लेमूं <निम्बू। कुरान शरीफ में मश्क (मुश्क या कस्तूरी); जंजबील (सोंठ या अदरक) और काफूर (कपूर) जैसे तीन हिंदी प्रदेशीय पदार्थों के नाम आये हैं। हिंदी का बेड़ा शब्द अरबी में बारजा बन गया; डोंगी> दोनीज़ तथा होड़ी (बम्बइया शब्द)> होरी। अंग्रेजी में भारतीय भाषाओँ से लगभग २,१०० शब्द गए हैं।
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