हिंदी देश को एकता की डोर में बांधने का काम करती है। आजादी की लड़ाई में जब पूरा देश अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहा था तब देश के कवियों और साहित्यकारों ने अपनी कलम की क्रांति से वो हुंकार भरी थी कि देश के युवा से लेकर हर वर्ग स्वतंत्रता पाने को लेकर व्याकुल हो उठे थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में हमारी सबसे बड़ी ताकत एकता थी और उस वक्त पूरे देश को एक सूत्र में बांधने में हिंदी ने निर्णायक भूमिका निभाई थी।
सैकड़ों बोलियों और भाषा वाले इस देश में हिंदी का स्थान अद्वितीय है। हजारों साल पुरानी इस भाषा ने न केवल पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है बल्कि आजादी की लड़ाई के दिनों में सबसे मुखर और मजबूत सम्पर्क सूत्र के रूप में भी काम किया। धीरे-धीरे हिंदी पुष्पित और पल्लवित होती गई और आज दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा बन गई है। अंग्रेजी, स्पेनिश और मंदारिन के बाद हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हमारे देश में ही करीब 77 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते, समझते और पढ़ते हैं। पूरी दुनिया में "हिंदी" हमारी पहचान बन चुकी है।
मानक हिंदी का विकास:
अष्टाध्यायी, अंगुत्तर निकाय, महाभारत (भीष्म पर्व), ब्रह्म पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, मार्कण्डेय पुराण, वामन पुराण के मध्यदेश में तेरह महाजन पद थे: कुरु-पांचाल, शूरसेन-मत्स्य, कोसल-काशी, वृजि-मल्ल (विदेह), मगध-अंग, चेदि-वत्स और अवन्ति। (ये जनपद आज की मानक हिंदी बोली-क्षेत्र को निर्धारित करते हैं)। इस सब जनपदों में कुरु जनपद विशेष महत्त्वपूर्ण था। यमुना से पश्चिम में सरस्वती और दृषद्वती के बीच का क्षेत्र कुरु-वन, कुरु-जांगल या कुरु-क्षेत्र कहलाता था जिसे मनु ने ब्रह्मावर्त्त कहा है। इसे आर्यों का प्राचीनतम जनपद माना जा सकता है। यहाँ की वर्तमान बोली हरयाणवी या बाँगरू है। यमुना के पूर्व का प्रदेश कुरु प्रदेश कहलाता है। इसकी महाभारतकालीन राजधानी हस्तिनापुर थी। वर्तमान कोरवी का आदर्श रूप, हस्तिनापुर के आसपास की बोली माना जा सकता है। मध्यकाल में कुरु-जांगल तथा कुरु-जनपद की सम्मिलित राजधानी इंद्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) थी। इसी कारण हरयाणवी तथा कोरवी में घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।
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