वाक्य-रचना: वाक्य-रचना की दृष्टि से हिंदी, फ़ारसी तथा अंग्रेजी से प्रभावित रही है। हिंदी की समास रचना प्रवृत्ति पर कहीं कहीं फ़ारसी प्रभाव दिखाई पड़ता है, जैसे- लीक-पखान (लीक-पखान पुरुष कर बोला- जायसी); कलक्टर अलीगढ़; हरी ओध आदि।  'जो' युक्त वाक्यों के प्रयोग काल्डवैल द्रविड़ प्रभाव मानते हैं। प्राकृत पैंगलभ में 'जो चाहहिं सो लेहि' प्रयोग है। हिंदी में इस प्रभाव की वृद्धि का कारण फ़ारसी प्रभाव है। हिंदी में एकवचन के लिए आदरार्थ बहुवचन का प्रयोग फ़ारसी प्रभाव के कारण है। हिंदी के आकारांतेतर विशेषणों की विशेष्य के अनुसार अपरिवर्तनीयता के प्रभाव के पीछे भी फ़ारसी प्रभाव दिखाई पड़ता है क्योंकि फ़ारसी में व्याकरणिक लिंग का अभाव है। हिंदी की संज्ञा एवं विशेषण के योग से निर्मित नामिक क्रियाएँ फ़ारसी का अनुबद्ध हैं जैसे-तंग करना (फ़ा. तंग कर्दन), खुश होना (फ़ा. खुश शुदन) । हिंदी में क्रिया से पूर्व क्रियाविशेषण के प्रयोग पर फ़ारसी प्रभाव है जैसे 'वह जल्दी जल्दी बोल रहा था।' (फ़ा. ऊ बितुंदी मी गुफ्त)। संस्कृत में क्रियाविशेषण का कोई स्थान निर्धारित नहीं था। समुच्चयबोधक ओर के प्रयोग पर संस्कृत का प्रभाव न होकर फ़ारसी प्रभाव है। संस्कृत में ' च' का प्रयोग योजना के लिए बाद में होता था जैसे 'श्यामा शिवश्च' जबकि फ़ारसी में इसका प्रयोग शब्दों के मध्य होता है जैसे - अल्लाह-उ-करीम। 'कि' का प्रयोग भी फ़ारसी से हिंदी में आया है। चूँकि, ताकि, जोकि, बशर्ते कि, आदि का प्रयोग फ़ारसी से हिंदी में आया है। इसी प्रकार 'या' का प्रयोग भी फ़ारसी प्रभाव के कारण हिंदी में आया है।


मध्ययुगीन पांडुलिपियों में मूर्धन्य 'ष' के स्थान पर 'ख' का प्रयोग 'भाषा' को 'भाखा' कर देता है। इसी प्रकार कभी कभी फ़ारसी लिपि के प्रभाव के कारण खान>कहान; छान>चहान ; घान >गहान ; झाड़ >जहाड़ ; ठाँव >टहांव ; ढाल >डहाल ; थाती >तहाती ; धन>दहन ; परस> पहरस; भोली>बहोली हो गया है। जिससे कभी कभी अर्थगत भ्रांतियां उत्पन्न हो जाती हैं।


अंग्रेजी प्रभाव के कारण हिंदी में 'बाई' के फलस्वरूप 'के द्वारा' का आगमन हुआ। पहले इस प्रकार का प्रयोग नहीं होता था जैसे - 'यह बात उन्होंने कही है' अब यह कहा जाता है 'यह बात उनके द्वारा कही गयी है।' . अंग्रेजी 'the' के अनुवाद - रूप हिंदी में समधिक प्रयोग 'वह' का प्रचलन हुआ। उदाहरणार्थ-The men went there 'वह आदमी वहां गया'। अंग्रेजी की direct तथा backhanded स्पीच के कारण 'मैं' के स्थान पर 'वह' का प्रयोग किया जाने लगा। जैसे 'उसने कहा कि मैं जाऊंगा' के स्थान पर अब-'उसने कहा कि वह जायेगा' का प्रचलन होता जा रहा है। अंग्रेजी के प्रभाव से वाक्य में बल के कारण पद-क्रम बदल जाता है जैसे-'मैंने उसे विद्यालय में घूसों से खूब मारा' तथा 'घूसों से मैंने उसे विद्यालय में खूब मारा'। पहले वाक्य में 'मैंने', पर बल है, दूसरे में 'घूसों' पर। अंग्रेजी के 'आइदर-ओर' के फलस्वरूप हिंदी में 'या… या' का प्रयोग होने लगा है। संस्कृत में 'या' के स्थान पर 'वा' हो जाता है। फ़ारसी से हिंदी में आगत 'और' का विकसित रूप अंग्रेजी के प्रभाव के कारण है। अंग्रेजी ने हिंदी को पंक्चुएशन मार्क दिये। अंग्रेजी से पूर्व हिंदी में विराम चिन्ह (।), या (।।) के रूप में लगाये जाते थे। अंग्रेजी ने हिंदी को व्यवस्थित गद्य रूप तथा अनेक गद्य-विधाएँ प्रदान कीं।


अंग्रेजी लिपि के प्रभाव से हिंदी का 'पुर/पुरा' (जागपुरा महाराज); सिद्ध, सिध >सिढ़; (सिधपुर >सिढ़पुरा); ड >द (भडुवा >भदुवा) बन गया। यही नहीं गुप्त>गुप्ता; मिश्र>मिश्रा हो गया (यानि पुरुष से स्त्री)। लड़कियों तथा लड़कों के नाम एक से होते लगे उदाहरणार्थ — रमेश बहल (स्त्री), सुमन सिंह (स्त्री), सीता (पुरुष), माया (पुरुष) आदि।


फ़ारसी तथा अंग्रेजी से अनेक वाक्यांश-जल्द से जल्द (जल्द-अज-जल्द); नए सिरे से (अज-सर-ए-नो), वस्तुतः, तत्त्वत: (as a matter of fact); अपेक्षाकृत (similarly); मुहावरे — दांतों तले उँगली दबाना (अंगुश्त-ब-दन्दां), जान की बाज़ी लगाना (बाज़ि-ए-जान-करदन); दांत खट्टे करना (दंदा, तुर्श-करदन); प्रकाश डालना (toss light); आँखों में धूल झोंकना (toss dust into eyes); लोकोक्तियाँ-हिम्मते मर्दां मददे ख़ुदा, नीम हकीम खतर-ए - जान, नीम मुल्ला खतर-ए-ईमान ( फ़ारसी), भौंकनेवाले कुत्ते काटते नहीं (yapping canines only sometimes nibble); प्रेम और लड़ाई में सब कुछ उचित है (Everything is fair infatuated and war) आदि हिंदी में आये हैं।


हिंदी, मेरे विचार से किसी महानगर की भाषा जैसी है। इस भाषा के निर्माण में आज लगभग सम्पूर्ण विश्व का योगदान है। आज हिंदी विश्व-भाषा का स्थान ग्रहण करने जा रही है। इस भाषा का आधार अवश्य कौरवी भाषा है, किन्तु मानक हिंदी आज न कौरवी है, न फ़ारसी, न अंग्रेजी, बल्कि भारत के नगरों — 'पटना, उज्जैन तथा दिल्ली के विशाल �

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