हिंदी को हम भाषा की जननी, साहित्य की गरिमा, जन-जन की भाषा और राष्ट्रभाषा भी कहते हैं। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि हिंदी भविष्य की भाषा है। हां, एक बात जरूर है कि हम इस भाषा का प्रयोग वास्तविक जीवन में जरूर करते है लेकिन यह रोजगार और महत्वाकांक्षी की भाषा बनने में थोड़ी कारगर नहीं बन पाई।
इससे यह जाहिर नहीं होता कि हिंदी का विकास नहीं हुआ। उपरोक्त में कई ऐसे तथ्य हैं, जो पूर्ण रूप से साबित करते हैं कि हिन्दी का विकास कितनी तेजी से हुआ है। हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपना बधाई संदेश हिंदी में प्रसारित करते हैं क्योंकि हिंदी भाषा अपनत्व का बोध कराती है।
जातीय भाषा का विकास वैसे ही नहीं होता जैसे किसी जनपदीय भाषा का होता है। कोई जनपदीय भाषा ज्यो की त्यों जातीय भाषा बन जाये, ऐसे नहीं होता। किसी जनपदीय भाषा को मुख्य आधार बनाकर कोई जातीय भाषा विकसित होती है किन्तु उसमे अन्य जनपदो से भाषा तत्त्व आकर घुल मिल जाते हैं और आधार भाषा के रूप को काफी बदल देते हैं।
इस तरह की प्रक्रिया हर जातीय भाषा के साथ घटित होती है। कलकत्ता की मानक बांगला या पुणे की मानक मराठी किसी जनपद में वहाँ की ग्रामीण भाषा के रूप में नहीं बोली जाती है। न अब मानक अंग्रेजी ब्रिटेन के किसी जनपद की ग्रामीण बोली है।
यह प्रकिया न समसझकर कुछ लोग हिंदी को कृत्रिम भाषा कहते हैं। यही हिंदी कृत्रिम है तो जितनी जातीय भाषाएँ हैं वे सब कृत्रिम हैं।देहाती बोलियों से संपर्क फिर भी उनसे अलगाव, जातीय भाषा की यह द्वंद्वात्मक विशेषता है।
जितना ही विशद जातीय भाषा का क्षेत्र होता है, उतना ही अधिक उसके रूपों की संख्या होती है। इसका कारण यह है की एक केंद्र से फैलनेवाली भाषा को अन्य जनपद प्रभावित करते हैं। बनारस की हिंदी आगरे की हिंदी से भिन्न है, कारण यह कि बनारस की हिंदी भोजपुरी से प्रभावित है और आगरा की हिंदी ब्रजभाषा से। इसी तरह इस समय की दिल्ली की भाषा पंजाबी से प्रभावित है और इलाहबाद की हिंदी अवधि से प्रभावित है।
जब यह जातीय भाषा अन्य जातीय क्षेत्रों में पहुँचती है तो वहाँ की जातीय भाषाओं का प्रभाव ग्रहण करती है और अपना स्थानीय रूप बनाती है। इस तरह कलकत्ता की हिंदी और मुंबई की हिंदी का अपना अलग अलग रूप है। और जब कलकत्ता, मुंबई बड़े शहर नहीं बने थे, तब हैदराबाद का अपना दक्खिनी रूप निराला था। यहाँ बोल-चाल के स्तर पर जो भाषा व्यवहार में आती है, उसकी चर्चा है। भाषा के लिखित रूप में जो समानता देखी जाती है, वैसी बोल-चाल के स्तर पर भाषा में नहीं देखी जाती। नाटकों, उपन्यासों, आदि में कभी कभी लेखक इस रूपों का व्यवहार करते हैं।
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