19वीं सदी के बाद काल हिंदी के इतिहास में आधुनिक काल माना जाता है. इस दौरान हिंदी कई बदलावों से गुजरी अंग्रेजी के प्रभाव के साथ साथ हिंदी का भी प्रभाव बढ़ता दिखाई दिया. पहले खड़ी बोली का प्रभुत्व रहा और धीरे धीरे हिंदी फारसी के प्रभाव से भी मुक्त होने लगी. 1860 के बाद हिंदी के गद्य स्वरूप का विकास होने लगा था. इसके बाद भारतेंदु हरीशचंद्र ने हिंदी को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया और उन्हें आधुनिक हिंदी का पितामह कहा जाता है.
भाषा वैज्ञानिकों के मुताबिक हिंदी साहित्य का इतिहास वैदिक काल से आरंभ होता है। समय-समय पर इसका नाम बदलता रहा। कभी वैदिक, कभी संस्कृत, कभी प्राकृतिक, कभी अपभ्रंश और अब हिंदी। हिंदी भाषा के उद्भव और विकास की प्रचलित धारणाओं के मुताबिक प्रकृत के अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी का उद्भव माना जाता है। इसे विद्यापति ने देसी भाषा कहा। हिंदी साहित्य का आरंभ 8वीं शताब्दी से माना जाता है। बौद्ध धर्म की एक शाखा वज्रयान के सिद्धो जनता के बीच उस समय की लोकभाषा में अपने मत का प्रचार किया। हिंदी का प्राचीन साहित्य इन सिद्धों ने पुरानी हिंदी में लिखा। इसके नाथ पंथी साधुओं ने बौद्ध शांकर, तंत्र योग और शैव मतों को मिलाकर नया पंथ चलाया उन्होंने लोक प्रचलित पुरानी हिंदी में अनेक धार्मिक ग्रंथ की रचना की। इसके बाद जैनियों की रचनाएं भी मिलती हैं। इसी काल में अब्दुल रहमान का काव्य संदेश रासक भी लिखा गया जिसमें प्रवृति बोलचाल के निकट की भाषा मिलती है।
11वीं सदी में देसी भाषा हिंदी का रूप साफ हुआ। इस काल में राजाओं के संरक्षण में चारणों और भाटों ने रासो के रूप में प्रचलित वीर गाथा लिखी। इसी दौरान मैथिल कोकिल विद्यापति हुए जिनकी पदावली में मानवीय सौंदर्य और प्रेम के अनुपम व्यंजना मिलती है। अमिर खुसरो का भी यही समय है, उन्होंने ठेठ खड़ी बोली में अनेक पहेलियां, मुकरियां और दो सखुन की रचना की। इन गीतों-दोहों की भाषा ब्रजभाषा है। 13वीं सदी के धर्म के क्षेत्र में फैले अंधविश्वास को तोड़ने के लिए भक्ति आंदोलन के रूप में भारत व्यापी सांस्कृतिक आंदोलन शुरू हुआ जिसने सामाजिक और व्यक्तित्व मूल्यों की स्थापना की।
इस तरह विभिन्न मतों का आधार हिंदी में निर्गुण और सगुण नाम से भक्ति काव्य की दो शाखाएं साथ-साथ चली। इस दौरान कई बड़े ग्रंथों की रचना हुई। 18वीं सदी के आसपास हिंदी कविता में नया मोड़ आया जो रीतिकाल के नाम से मशहूर हुआ। इसे तत्कालिक दरबारी संस्कृति और संस्कृत साहित्य से बढ़ावा मिला तो वहीं आधुनिक काल यानि 19वीं सदी में भारतीयों का यूरोपीय संस्कृति से सम्पर्क हुआ। नए युग के साहित्य की प्रमुख संभावनाएं खड़ी बोली गद्य में भी थी। इसलिए इसे गद्य युग भी कहा गया। हिंदी का प्राचीन गद्य राजस्थानी, मैथिली और बृज भाषा में मिलता है। वहीं खड़ी बोली की परम्परा प्राचीन है। अमिर खुसरो से लेकर भारत भूषण तक के काव्य में इसके उदाहरण हैं।
इस तरह अपनी उत्पत्ति के बाद से हिंदी लगातार समृद्ध होती गई और इसका रुतबा भी बढ़ता गया। आज हिंदी में कामकाज जोर पकड़ रहा है। सोशल मीडिया और नई-नई तकनीकों में हिंदी का उपयोग किया जा रहा है। इससे न सिर्फ हिंदी का दायरा बढ़ रहा है बल्कि वैश्विक स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़े रहे हैं। आजादी के बाद के सात दशकों में संचार माध्यमों में हिंदी बहुत मजबूत हुई है। हिंदी के अखबारों का प्रसार बहुत तेजी से बढ़ा है।
इसके बाद अंग्रेजों का भी हिंदी को व्यापक भाषा बनाने में अप्रत्यक्ष योगदान दिया. ईसाई पादरियों ने अपने धर्म प्रचार के लिए हिंदी का उपयोग किया. इसके अलावा जब भी अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल, महाराष्ट्र आदि प्रांतों के लोगों को आपस में संवाद करने की जरूरत पड़ी तो हिंदी ही उनका माध्यम बनती गई. 20वीं सदी में मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत आदि रचनाकारों ने हिंदी को विस्तार दिया.
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