हिंदी के आधुनिक काल तक आते-आते ब्रजभाषा जनभाषा से काफ़ी दूर हट चुकी थी और अवधी ने तो बहुत पहले से ही साहित्य से मुँह मोड़ लिया था। 19वीं सदी के मध्य तक अंग्रेज़ी सत्ता का महत्तम विस्तार भारत में हो चुका था। इस राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव मध्य देश की भाषा हिंदी पर भी पड़ा। नवीन राजनीतिक परिस्थितियों ने खड़ी बोली को प्रोत्साहन प्रदान किया। जब ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक रूप जनभाषा से दूर हो गया तब उनका स्थान खड़ी बोली धीरे-धीरे लेने लगी। अंग्रेज़ी सरकार ने भी इसका प्रयोग आरम्भ कर दिया।


हिंदी के आधुनिक काल में प्रारम्भ में एक ओर उर्दू का प्रचार होने और दूसरी ओर काव्य की भाषा ब्रजभाषा होने के कारण खड़ी बोली को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। 19वीं सदी तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। 20वीं सदी के आते-आते खड़ी बोली गद्य-पद्य दोनों की ही साहित्यिक भाषा बन गई।


इस युग में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने में विभिन्न धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों ने बड़ी सहायता की। फलतः खड़ी बोली साहित्य की सर्वप्रमुख भाषा बन गयी।


भारतीय आर्य भाषाओं का प्रारंभ १५०० ई. पूर्व से ५०० ई. पू. तक माना जाता है तथा इनके विकास में ही हिंदी तथा उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं का मूल स्रोत निहित है। वह स्रोत संस्कृत भाषा है। इसके दो रूप मिलते हैं-


१. वैदिक संस्कृत-इसके अंतर्गत वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों की रचना है। यह भाषा पाणिनि के काल से, बहुत पहले से प्रचलित थी।


२. लौकिक संस्कृत-वैदिक संस्कृत से ही लौकिक संस्कृत का जन्म हुआ। लौकिक संस्कृत में पाणिनीय संस्कृत, देवभाषा संस्कृत और क्लासिकल संस्कृत भी है। पांचवी शती ई. पू. में पाणिनि ने अपने व्याकरण द्वारा संस्कृत को एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया तब से आज तक उसका वही स्वरूप मान्य है।


पाणिनि द्वारा संस्कृत को नियमों से बांध दिए जाने पर भी व्यवहार में स्वच्छंद उन्मुक्त भाषा भौतिक रूप में निरंतर प्रवाहित होती रही। इसी लोक भाषा का विकसित रूप प्राकृत कहलाया।


प्राकृत भाषा काल ५०० ई. पू. से १००० ई. माना गया है। इसी से आगे चलकर पाली एवं अपभ्रंश भाषा निकली। पाली भाषा में गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश दिए। उन्हीं से संबंधित साहित्य की रचना पाली भाषा में की गई। 'पिटक' और 'अनुपिटक' में विभाजित पाली साहित्य आज भी विदेशी भाषाओं और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है। अशोक के शिलालेख भी पाली प्राकृत में लिखे गए हैं।


अपभ्रंश प्राकृत और आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी है। आचार्य पतंजलि के महाकाव्य में अपभ्रंश का प्रयोग मिलता है, जहां उसका अर्थ परिनिष्ठित शब्द का विकृत या बिगड़ा रूप दिया गया है। भामह के 'काव्यालंकार' और चंद के 'प्राकृत लक्ष्मण' में भाषा के अर्थ में अपभ्रंश का प्रयोग मिलता है। अपभ्रंश को 'ग्रामीण भाषा', 'देसी', 'देशभाषा', 'अभीरोक्ती', 'अवहट्ट' आदि नामों से भी अभिहित किया जाता है।


अपभ्रंश से हिंदी का जन्म हुआ। आठवीं शती में सिद्धों की अवहट्ट भाषा से हिंदी अपना आकार ग्रहण करती है। अवहट्ट को पुरानी हिंदी भी कहा गया है।

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